यूनेस्को की AI रिपोर्ट में अमन कुमार की आवाज बनी समावेशन की मिसाल

By InduPaper Editorial | Baghpat / New Delhi | June 25, 2026 | Achievement

यूनेस्को से जुड़े भारत के तकनीक नीति विमर्श में बागपत के युवा सामाजिक कार्यकर्ता और MY Bharat स्वयंसेवक अमन कुमार की बात को ग्रामीण युवाओं, सूचना-असमानता और डिजिटल समावेशन की मजबूत आवाज के रूप में देखा जा रहा है।

अमन कुमार ने यूनेस्को AI नीति दस्तावेज जिलाधिकारी अस्मिता लाल को सौंपा
अमन कुमार ने यूनेस्को AI नीति दस्तावेज जिला प्रशासन को सौंपते हुए समावेशी तकनीक नीति में ग्रामीण युवाओं की भागीदारी पर जोर दिया।

क्या भारत का डिजिटल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाला कल सिर्फ बड़े शहरों के चमकते डेटा सेंटरों और कंप्यूटर एल्गोरिद्म से तय होगा? संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को से जुड़े भारत के AI नीति विमर्श ने इस सवाल को नए सिरे से सामने रखा है। इस विमर्श में समावेशन की बात समझाने के लिए बागपत के युवा सामाजिक कार्यकर्ता अमन कुमार की यात्रा और विचारों को खास महत्व मिला है।

अमन कुमार उन युवाओं में शामिल हैं जो तकनीक को सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि अधिकार, अवसर और प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि AI की नीतियां तभी न्यायपूर्ण बनेंगी, जब गांवों, वंचित युवाओं और स्थानीय समुदायों को नीति बनाने की मेज पर वास्तविक जगह मिलेगी।

37 करोड़ युवाओं का भविष्य और डिजिटल खाई

भारत में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 37 करोड़ युवा हैं और देश की आधी से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है। AI, डिजिटल शासन और डेटा आधारित अर्थव्यवस्था आने वाले वर्षों में इन्हीं युवाओं के अवसरों, नौकरियों और सामाजिक भागीदारी को गहराई से प्रभावित करेगी।

इस पृष्ठभूमि में डिजिटल खाई का सवाल और गंभीर हो जाता है। ग्रामीण भारत में हाई-स्पीड इंटरनेट, डिजिटल साक्षरता और AI आधारित सेवाओं तक पहुंच अभी भी असमान है। अमन कुमार जैसे युवा इसी असमानता को जमीनी स्तर पर महसूस करते हुए सूचना और अवसरों की पहुंच को सामाजिक मिशन बना रहे हैं।

मुख्य बात: अमन कुमार का संदेश है कि AI नीति सिर्फ तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर का विषय नहीं, बल्कि सूचना, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का भी विषय है।

इन्फॉर्मेशन गैप से नीति विमर्श तक

बागपत के एक गांव में पले-बढ़े अमन कुमार की कहानी ग्रामीण भारत में अवसरों की असमानता को सामने लाती है। बचपन में वह स्कूल जाने से पहले साइकिल से गांव-गांव अखबार पहुंचाते थे। उन्हीं अखबारों के पन्नों से उन्हें छात्रवृत्ति, प्रतियोगिताओं और सरकारी योजनाओं की जानकारी मिली।

यहीं से उन्हें समझ आया कि गांवों में प्रतिभा की कमी नहीं होती, कमी सही समय पर सही सूचना की होती है। इसी सूचना-अंतर यानी इन्फॉर्मेशन गैप को कम करना अमन ने अपना सामाजिक मिशन बनाया। बाद में MY Bharat से जुड़कर उन्होंने युवाओं को अवसरों, प्रतियोगिताओं और सरकारी पहलों से जोड़ने का काम तेज किया।

वह सवाल जिसने नीति मेज पर गांवों की आवाज रखी

नई दिल्ली में हुई राष्ट्रीय परामर्श प्रक्रिया के दौरान अमन कुमार ने तकनीक से पहले इंसानी हक और सामाजिक विस्थापन का सवाल उठाया। उनका तर्क था कि अगर AI नीति स्थानीय समुदायों को सुने बिना बनेगी, तो तकनीक पुरानी असमानताओं को और गहरा कर सकती है।

जब कोई बच्चा गरीबी के कारण पढ़ाई छोड़ मजदूरी करने जाता है, तो समाज उसे बदकिस्मत कहता है। वही बच्चा जब अपराध की ओर मुड़ जाता है, तो समाज उसे अपराधी कह देता है। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि उसे इस मोड़ पर धकेलने वाला पहला सूचनात्मक और सामाजिक विस्थापन क्या था?

अमन का कहना है कि युवा अब केवल दर्शक नहीं रह सकते। उन्हें AI और डिजिटल नीति के सह-निर्माता के रूप में शामिल करना होगा, ताकि तकनीक समाज के कमजोर वर्गों को पीछे छोड़ने के बजाय आगे बढ़ाने का माध्यम बने।

हाशिये से राष्ट्रीय मेज तक

बागपत की गलियों से उठकर राष्ट्रीय और वैश्विक नीति विमर्श तक पहुंची अमन कुमार की आवाज इस बात का प्रतीक है कि हाशिये और मुख्यधारा के बीच की दूरी स्थायी नहीं होती। सही प्रतिनिधित्व, अवसर और सूचना मिल जाए तो ग्रामीण युवा भी बड़े नीति विमर्शों को दिशा दे सकते हैं।

यूनेस्को से जुड़े AI नीति विमर्श का बड़ा संदेश यही है कि डिजिटल भारत की तैयारी सिर्फ कंप्यूटर, डेटा और एल्गोरिद्म से पूरी नहीं होगी। उसमें उन युवाओं की आवाज भी शामिल करनी होगी, जिनके जीवन पर तकनीक का प्रभाव सबसे अधिक पड़ेगा।

Source: Local news submission received by InduPaper.