गावों से गुम हो रही कजरी गायन की विधा

InduPaper Editorial | बक्सर, बिहार | 11 अगस्त 2026 | स्थानीय समाचार

कजरी एक ऐसी गायन विधा है जो आसाढ़ में खेतों से होकर सावन में बाग-बगीचों को अपने परंपरिक गीतों से सजाती थी। मिर्जापुर की कजली से डुमरांव के सुरों तक पहुंची यह लोकधारा अब मोबाइल के शोर में खो रही है।

संक्षेप में: शाहाबाद-बक्सर क्षेत्र में सावन के महीने खेतों और मंदिरों में गूंजने वाली कजरी गायन की परंपरा अब स्मार्टफोन, डीजे संस्कृति और सामूहिक मेलजोल की कमी के कारण तेजी से लुप्त हो रही है।

मिर्जापुर की कजली से बक्सर के सुरों तक

सावन की पहली फुहार पड़ते ही कभी गांवों का रंग बदल जाता था। आम-जामुन की डालियों पर झूले पड़ जाते, मंदिरों और बाग-बगीचों में महिलाओं की टोलियां जुटतीं और ढोलक-मंजीरे की थाप पर कजरी के सुर हवा में घुल जाते। आज सावन आता तो है, पर वह सामूहिक कजरी धीरे-धीरे गांवों की स्मृतियों में सिमटती जा रही है।

कजरी की लोककथा का एक सिरा मिर्जापुर से जुड़ता है। जनश्रुति के अनुसार राजा कंतित की पुत्री कजली ने पति-वियोग में विरह गीत गाए थे। मिर्जापुर जिला प्रशासन भी कजली महोत्सव की परंपरा को इसी लोककथा से जोड़ता है। समय के साथ कजली के विरह गीतों की यह धारा सावन के लोकजीवन में फैल गई।

इस लोकपरंपरा का एक अहम पक्ष देवी आराधना भी रहा है। मिर्जापुर की लोक-सांस्कृतिक परंपरा में कजरी गायन के साथ मां विंध्यवासिनी की स्तुति का उल्लेख मिलता है। यहीं से कजरी में विरह के साथ आस्था, प्रेम और ग्रामीण जीवन के रंग घुलते चले गए।

शाहाबाद-बक्सर में रची-बसी लोकधारा

पूर्वांचल से भोजपुरी अंचल की ओर बढ़ी यह लोकधारा जब शाहाबाद और बक्सर तक पहुंची, तो यहां के ग्रामीण जीवन में रच-बस गई। इस क्षेत्र की अपनी समृद्ध संगीत परंपरा ने लोकधुनों के लिए सांस्कृतिक जमीन तैयार की। डुमरांव के धनगाई घराने की करीब चार सौ साल पुरानी संगीत परंपरा इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।

लेखक ललन शुक्ला और रामशंकर दुबे के अनुसार शाहाबाद की सांस्कृतिक पहचान में लोकगीतों और संगीत की परंपरा हमेशा अहम रही है। इसी सांगीतिक माहौल में कजरी जैसी लोकधुनों ने गांवों में अपना अलग संसार बनाया।

पैगम्बरपुर के बाग और मंदिर — सावन की जीवंत स्मृतियां

पैगम्बरपुर के मलिया बाग, बुढ़वा शिव मंदिर और काली मां मंदिर के आसपास कभी सावन में मेले सा माहौल रहता था। दिन में स्कूल से लौटते बच्चे मलिया बाग में झूला झूलते और शाम होते ही गांव की महिलाएं कजरी गाने के लिए जुट जातीं।

पैगम्बरपुर निवासी बुजुर्ग रामकुमार ओझा बताते हैं, "पहले मंदिर परिसर और पेड़ों की छांव में घंटों लोकगीत गूंजते थे।"

धान की रोपनी भी कजरी से जुड़ी थी। खेतों में काम करती महिलाओं की सामूहिक आवाज श्रम की थकान कम करती थी। ये गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के मेल-जोल और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद का माध्यम थे।

परंपरा पर संकट

अब यह परंपरा टूट रही है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने मनोरंजन के साधन बदल दिए हैं। डीजे संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के बीच स्थानीय लोक कलाकारों के लिए मंच और श्रोता दोनों घटे हैं।

पवन ओझा, प्रद्युम्न माली, सर्वजीत दुबे और सोनू ओझा जैसे कलाकारों को चिंता है कि संरक्षण और नई पीढ़ी की भागीदारी नहीं मिली तो कजरी गांवों से गायब हो सकती है।

एक संस्कृति को बचाने की लड़ाई

कजरी को बचाने की लड़ाई सिर्फ एक लोकगीत को बचाने की लड़ाई नहीं है। यह उस ग्रामीण संस्कृति को बचाने की कोशिश है, जिसमें सावन सिर्फ मौसम नहीं, उत्सव था; झूला सिर्फ खेल नहीं, मिलन का बहाना था और गीत केवल मनोरंजन नहीं, पीढ़ियों की स्मृति थे।

मिर्जापुर की कजली की लोककथा से लेकर डुमरांव की संगीत परंपरा और बक्सर के गांवों की सावनी शाम तक की यह यात्रा आज अपने आखिरी पड़ाव पर खड़ी दिखती है। सवाल है कि अगली पीढ़ी को कजरी सिर्फ किताबों में मिलेगी या किसी गांव की शाम में उसका जीवंत स्वर भी सुनाई देगा?

स्रोत: स्थानीय समाचार — बक्सर, बिहार।